पुन्‍हा गुंतलो तुझ्यात मी...
सावरलो होतो तुझ्यातूनी,
मन तरंग होऊन पाण्‍यावरती
परी का कळेना या मनी
स्‍वप्‍नात येत का जे कुणी...
पुन्‍हा गुंतलो तुझ्यात मी...
फुलाच्‍या या गंधातुनी,
बोलतं कोणी या हवेतुनी...
अाकाशात रंग उधळूनी...
जीवन फुलून उठते खळखळूनी
पुन्‍हा गुंतलो तुझ्यात मी...
नवी साद ऐकू येई स्‍पंदनातुनी,
नवी गीत तयार होई, या मनातुनी..
अन् जाणीव होई या स्‍पर्शातुनी,
जे म्हणतं 'तुच माझी' ह्या ह्दयातूनी
पुन्‍हा गुंतलो तुझ्यात मी...
                                                                            - स्‍वप्‍नील चटगे
 
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