पुनवेची रात,
त्‍यासी चांदण्‍याची साथ...
उतरलो मी,
प्रेम रंगणात...
अनं गुंतलो मी तुझ्यात,
जाणवतो सहवास,
फुलांच्‍या गंधात...
नि स्‍पर्श करणा-या,
थंड गारव्‍यात...
वाट पाहत तुझी,
या नाजुक स्‍वप्‍नात...
या वाहणा-या नदीत,
सामवयाचे हे मनात
नि प्रेमाचा स्‍पर्श...
या तुझ्या स्‍पंदनात,
पुनवेची रात
त्‍याची चांदण्‍याची साथ 
                                                                - स्‍वप्‍नील चटगे
 
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